Tuesday, October 8, 2019

विजयादशमी-कविता/Poem-on-Vijayadashami



         💥विजयादशमी /दशहरा 💥


आओ मिलकर’ कुछ यूं; “विजयादशमी” मनाए,
“नकली रावण” को छोड़कर, कपट, अहम, आडंबर को हम जलाएं|
क्या है औचित्य पुतला फूंकने का? जब तक “मन के रावण” को ना हराएं,
आओ मिलकर, कुछ यूं विजयादशमी मनाए||



अधर्म पर धर्म की जय को; ‘श्री राम की विजय को’
क्यों ना; खुद पर, अमल में लाएं|
स्वयं सिद्धि को त्यागकर; छल- कपट, मद- मोह को भगाएं,
आओ मिलकर; कुछ यूं, विजयादशमी मनाए||



घनघोर तिमिर के आगोश में’, प्रचंड हवाओं के रोष में,
ज्ञान का दीपक जलाएं’, परोपदेश को छोड़कर, स्वयं पर नियंत्रण लाएं|
देशहित में’ तत्पर होकर; मातृभूमि का मान बढ़ाएं,
आओ मिलकर’ कुछ यूं विजयादशमी 
मनाए ||

“भ्रष्टाचार” हो या “व्यभिचार” हो; तनिक ना, मन में आने पाए,
मेरा-तेरा को त्याग कर, वसुदेव कुटुंबकम शाश्वत बनाएं|
अहम् के “रावण” को, त्याग कर; विनम्रता का 
राम बसाए'
आओ मिलकर’ कुछ यूं, विजयादशमी मनाए||




दशहरा त्यौहार कविताएँ | Poem on Dussehra in Hindi/विजयादशमी-कविता/Poem-on-Vijayadashami
विजयादशमी

⇜जितेन्द्र राठौर⇝





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9 comments:

  1. Very nice... Aaj insan ko apne under k rawan ko jalane ki jarurat h bhai.... Putle ko kya jalate ho jalana h toh apne under k rawan ko jalao.... Is kalyug k rawan ko Happy dussera

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  2. Very nice... Aaj insan ko apne under k rawan ko jalane ki jarurat h bhai.... Putle ko kya jalate ho jalana h toh apne under k rawan ko jalao.... Is kalyug k rawan ko Happy dussera

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